शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाना राजनीतिक अदूरदर्शिता

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।

अशर्फी लाल मिश्र 






राज्य सरकार या केंद्र सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों की सेवा निवृत्ति आयु को बढ़ाने का अधिकार तो है लेकिन बिना राष्ट्रीय हानि  लाभ का आकलन किए कर्मचारियों की सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाना अदूरदर्शिता होगी।

सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाने से हानियाँ

1- 60 वर्ष की आयु के बाद शारीरिक क्षमता में कमी आ जाती है अतः हर कर्मचारी आगे सेवा नहीं करना चाहता।

2- फील्ड या बॉर्डर या फिर उंचाई पर कार्य प्रभावित होगा।

3- पेंशन में वृद्धि के लालच  में  कर्मचारी स्वेच्छा से सेवा निवृत्त नहीं होना चाहते।

4-जिंक फूड  एवं फास्ट फूड के प्रचलन के कारण कर्मचारियों में  शारीरिक मोटापा बढ़ रहा है जिसके  कारण भी कर्मचारियों में कार्य क्षमता कम हो रही है।

5- लगभग 10 % कर्मचारी ही शारीरिक रूप से फिट रहते है उन्हें आगे काम का अवसर दिया जा सकता है।

6- कम क्षमता के कर्मचारियों की सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाने से राष्ट्रीय क्षति होगी।

7- रोजगार पाने की पंक्ति में खड़ी युवा पीढ़ी में भी असन्तोष फैलेगा।

8-विपक्ष को एक राजनीतिक अवसर उपलब्ध होगा।

लाभ 

1- सेवा निवृत्त कर्मचारियों  को GPF एवं ग्रेच्युटी का भुगतान न करने से सरकार को वित्तीय राहत मिलेगी।

2-कुछ अनुभवी एवं कर्मठ कर्मचारियों का भी लाभ मिलेगा।

ओपिनियन 

1-सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाना राजनीतिक अदूरदर्शिता होगी।

2- सेवा निवृत्ति बढ़ाने से राष्ट्रीय क्षति होगी।

3-रोजगार  पाने की पंक्ति में खड़ी युवा पीढ़ी में असंतोष फैलेगा।

4- विपक्ष को एक राजनीतिक मुद्दा मिलेगा।


शुक्रवार, 17 जून 2022

अग्निपथ योजना का विश्लेषण

 --अशर्फी लाल मिश्र

अशर्फी लाल मिश्र






Updated on 03/01/2023

 मोदी सरकार की  अग्निपथ योजना का संक्षिप्त विश्लेषण निम्न्वत है:

1-अनिवार्य सैनिक सेवा

आज सारा विश्व परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ा हुआ है ।कोई भी देश पूर्ण रूपेण आत्म निर्भर नहीँ है ।आज व्यापार भी परमाणु धमकी से प्रभावित हो रहा है। कब कौन देश किस देश को अपने शिकंजे में  जकड़ ले कहा नहीँ जा सकता।

आज हर देश की सीमाएँ  सदैव खतरे में ही रहती हैँ । इसी खतरे को ध्यान में रखते हुए विश्व के कई देशों ने अपने यहाँ अनिवार्य सैनिक सेवा लागू कर दी । इनमें प्रमुख देश हैँ  इजराइल, रूस, ब्राजील,उत्तरी कोरिया, दक्षिण कोरिया आदि ।

कुछ ऐसे भी देश हैं जहाँ महिलाओं के लिए भी अनिवार्य सैनिक सेवा है । जैसे इजराइल ।

अग्निपथ  योजना  से  स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि भारत भी अनिवार्य सैनिक सेवा के लक्ष्य की ओर अग्रसर होना  चाहता है। वर्तमान परिस्थितियों में अग्निपथ  योजना उत्तम है लेकिन इस योजना के  कार्यान्वयन से  पूर्व  इसकी महत्ता एवं आवश्यकता का   जनता में  प्रचार प्रसार किया जाना जरूरी था।

2-बढ़ती वरिष्ठ नागरिकों की आवादी

देश में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसी के साथ कार्यरत कर्मचारियों की तुलना में पेंशनरों की संख्या में भी वृद्धि होती जा रही है।

कहने का अर्थ यह है एक तरफ जहाँ भारत बूढ़ा हो रहा है तो दूसरी तरफ युवा शक्ति में कमी आ रही है । इसका अर्थ आप यह भी लगा सकते हैं कि खर्चा अधिक आय कम।

3-बढ़ता वित्तीय असंतुलन

वर्तमान में रक्षा बजट का लगभग 83% वेतन एवं पेंशन पर खर्च हो जाता है [a] रही बात शेष बजट से सेना का आधुनिकीकरण करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।

ऐसा प्रतीत होता है कि इस  अग्निपथ योजना के माध्यम से पेंशन में खर्च होने वाला बजट सेना के आधुनिकीकरण के काम आयेगा।

4-लाभ

(1)धीरे धीरे देश अनिवार्य सैनिक सेवा की ओर अग्रसर होगा।

(2) पेंशन न देने के कारण बचत का बजट सेना के आधुनकीकरण में काम आयेगा। 

योजना का विरोध

नवयुवकों द्वारा अग्निपथ का विरोध  जिस ढंग से किया जा रहा है वह निंदनीय है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, आगजनी करना , आवागमन बाधित करना जैसे कार्य राष्ट्र विरोधी हैं।

अभिमत 

(1 ) सेना से अवमुक्त अग्निवीरों को केन्द्रीय असैनिक बलों / प्रांतीय सशस्त्र पुलिस में कुछ पद  आरक्षित किए जा सकते हैं।

(2) सेना से अवमुक्त अग्निवीरों को केन्द्र/राज्य की सेवाओं में कुछ वेटेज अंक भी दिए जा सकते हैं जैसे NCC के लिए वेटेज अंक दिए जाते हैं।

(3) नवयुवकों  द्वारा इस योजना का  विरोध करने का तरीका अनुचित एवं निंदनीय।

(4) अग्निवीरों को राज्यों में होम गार्ड  सेवा में वरीयता दी जानी चाहिए।





शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

गार्गी : एक महान दार्शनिक

 --अशर्फी लाल मिश्र 

अशर्फी लाल मिश्र 



 




   जब जब वैदिक कालीन दार्शनिकों ,विद्वानों एवं तत्व वेत्ताओं का उल्लेख होता है  तब तब महिला विद्वानों में ब्रह्मवादिनी कन्या  गार्गी का  उल्लेख सर्वोपरि होता है। गार्गी,  गर्गवंशीय वचक्नु नामक  ऋषि की पुत्री थी और नाम रखा गया " वाचकन्वी गार्गी "। गार्गी का जन्म लगभग 700 ईसा पूर्व माना  जाता है। 

 विदुषी  गार्गी ने एक बार तात्विक वाद विवाद में ऋषि याज्ञवल्क्य  को भी निरुत्तर कर दिया था। ऋषि याज्ञवल्क्य अपने समय के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक माने  जाते थे और आज भी। गार्गी ने न  केवल वैदिक वाद विवाद में ख्याति प्राप्त की अपितु वेदों की ऋचाओं के लिखने भी अमूल्य योगदान किया। 

ऋषि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां थी कात्यायनी और मैत्रेयी।  कात्यायनी गृहस्थ महिला थी जब कि मैत्रेयी विदुषी , तत्व वेत्ता एवं अपने पति  द्वारा रचित वेदों की ऋचाओं को लिपिवद्ध करने में सहायता करती  थी। अतः ऋषि याज्ञवल्क्य मैत्रेयी का बहुत अधिक आदर करते थे। 

देवी के रूप में गार्गी की पूजा 

चूँकि ऋषि याज्ञवल्क्य अपनी पहली पत्नी कात्यायनी की तुलना में दूसरी पत्नी मैत्रेयी का  बहुत  आदर करते थे इसलिए कात्यायनी ,मैत्रेयी से मन ही मन ईर्ष्या करने लगी। एक दिन ऐसा आया कि वाचकन्वी गार्गी  शास्त्रार्थ  के लिए ऋषि याज्ञवल्क्य  के आश्रम आ पहुंची। शास्त्रार्थ में  गार्गी ने ऋषि याज्ञवल्क्य को निरुत्तर कर दिया। इस घटना से कात्यायनी अति प्रसन्न हुईं और वाचकन्वी गार्गी की भूरि भूरि प्रशंसा की।

गार्गी -याज्ञवल्क्य संवाद 







कात्यायनी ,ऋषि कात्यायन की पुत्री थीं। कात्यायनी ने याज्ञवल्क्य को निरुत्तर करने देने  वाली गार्गी की प्रशंसा का सन्देश अपने पिता कात्यायन  भेजा। चूँकि बेटी का सम्मान ससुराल में कम था इसलिए  याज्ञवल्क्य के पराजित होने पर  कात्यायन ऋषि अति प्रसन्न हुए और उन्होंने  अपने कात्यायन  गोत्र  (वंश )के लोगों को विदुषी गार्गी का सार्वजानिक रूप में सम्मान करने को कहा. तब से आज तक कात्यायन गोत्रीय (मिश्र ) लोग विदुषी गार्गी का सम्मान करते आ रहे हैँ. कालांतर में विदुषी गार्गी के सम्मान के स्थान पर देवी के रूप में पूजा होने लगी  जो आज तक हो रही है.यह पूजा वर्ष में दो बार होती है पहली पूजा चैत्र मास में बासंती नवरात्रि के बाद त्रयोदशी को और दूसरी पूजा आश्विन मास में शारदीय नवरात्रि के बाद त्रयोदशी को की जाती है.

कात्यायन गोत्रीय मिश्र, नव देवियों की ही भांति गार्गी देवी की पूजा करते हैँ. और इस अवसर पर अपने बच्चों के कर्ण भेदन, मुंडन आदि  संस्कार भी आयोजित करते हैँ.

वाचकन्वी गार्गी आजन्म अविवाहित रहीं.

--अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर.


गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

भारतीय लोकतंत्र में मीडिया की कमजोर भूमिका

 ब्लॉगर :  अशर्फी लाल मिश्र 

अशर्फी लाल मिश्र




 


मीडिया (प्रिंट/वेब  ,इलेक्ट्रॉनिक या सोशल ) लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ है। 

 मीडिया लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ है जिसका दायित्व है जनहित की पहरेदारी। 

 लोकतंत्र के प्रमुख अंग 

(a) व्यवस्थापिका 

(b ) कार्यपालिका 

(c ) न्यायपालिका 

एवं मीडिया को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ कहा जाता है। 

मीडिया का दायित्व 

इस  डिजिटल युग में मीडिया का दायित्व बहुत ही चुनौती पूर्ण है। मीडिया का कार्य है जनहित की पहरेदारी। अब प्रश्न उठता है की जनहित कहाँ कहाँ प्रभावित होता है। जनहित लोकतंत्र में किसी भी स्थान में प्रभावित हो सकता है। 

रिपोर्टिंग एक जोखिम भरा कार्य होता है जो हर व्यक्ति नहीं कर सकता। 

सर्वे गुणः कांचन माश्रयन्ति 

उक्ति सूक्ति  का अर्थ है कि सोने में सभी  गुण  होते हैं। हमारा यहाँ  कहने का अर्थ यह है कि धन सबको प्रभावित करता है। शासन का कोई भी तंत्र क्यों न हो अधिकांशतः धन से प्रभावित हो जाते हैं कोई कम कोई अधिक और जो प्रभावित नहीं होते उनकी संख्या अँगुलियों से गिनी जा सकती है। 

मीडिया पूर्णतया निष्पक्ष नहीं 

मीडिया में हम प्रिंट /वेब मीडिया,इलेक्ट्रॉनिक  या सोशल मीडिया को ले सकते हैं. मीडिया  के ये सभी  ही अंग किसी न किसी राजनीतिक दल से प्रभावित रहते हैं।  इसमें सोशल मीडिया पूर्ण रूपेण अनियंत्रित है रही बात प्रिंट/वेब मीडिया की बात यह भी ये भी पूर्णतया निष्पक्ष नहीं हैं यह संस्थाएं या तो किसी राजनीतिक दल या फिर अप्रत्यक्ष फंडिंग से प्रभावित रहते हैं। 

रही बात रिपोर्टिंग की तो कुछ रिपोर्टर निश्चित रूप से जोखिम भरा एवं सराहनीय कार्य करते हैं लेकिन कुछ रिपोर्टर विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र के घटिया रिपोर्टिंग करते हैं जो प्रत्यक्ष /अप्रत्यक्ष रूप से फंडिंग से प्रभावित रहते हैं। ब्यूरोक्रेसी तो  घटिया रिपोर्टिंग से  प्रभावित रहती है लेकिन जनप्रतिनिधि भी बिना प्रभावित हुए नहीं रहते। प्रिंट/वेब मीडिया या फिर सोशल मीडिया  में हर कोई अपनी प्रशंसा का भूखा रहता है इस मानव प्रवृति के कारण कमजोर मानसिकता के लोग अपने स्थान /अपनी गरिमा को भूल जाते हैं।

ओपिनियन 

1 - वर्तमान  समय में  पत्रकारिता में डिप्लोमा /उपाधि उप्लब्ध हैं अतः पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों को ही रिपोर्टिंग का काम सौंपा जाय।  


शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

लोकतंत्र और विपक्ष

ब्लॉगर : अशर्फी लाल मिश्र 

लोकतंत्र में विपक्ष की महती भूमिका होती है। इस कटु सत्य से कोई इंकार भी नहीं कर सकता है और बिना मजबूत विपक्ष के लोकतंत्र में भी एक तंत्र की भावना का उदय हो सकता है। 
 हमने एक पूर्व मुख्य मंत्री के मुंह से सुना कि " जनता के मूड को बदल दो और सत्ता  छीन  लो " लेकिन उक्त कथन सत्ता प्राप्त करने का एक अस्त्र हो सकता है लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष का जो जनता के प्रति दायित्व है उसकी ओर संकेत  नहीं दिखाई देता। 

लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व 
 
लोकतंत्रीय शासन में विपक्ष की भूमिका का विशेष महत्व है।
उसका दायित्व है :
1-जब सरकार / सत्ता दल राष्ट्रीय भावना या राष्ट्रहित में कार्य न करे तो उसे सदैव सचेत करे ।
 2-नौकरशाही अपने कर्तव्यों में असफल हो रही हो तो भी विपक्ष सरकार को  सचेत करे। 
३-समय समय पर कुछ अप्रिय या कानून व्यवस्था सम्बन्धी  घटनाएं भी होती है। इन घटनाओं में भी विपक्ष की भूमिका न्यायोचित होनी चाहिए।
यदि विपक्ष अपने पूरे कार्य काल में अपने कर्तव्य का निर्वहन करे तो शासक दल  सचेत रहकर जनहित में अग्रसर रहेगा।  
 
लोकतंत्र में विपक्ष का लक्ष्य 

लेकिन अक्सर देखने में यह आता है जब चुनावी वर्ष आता है तभी विपक्ष अपनी सक्रिय भूमिका में दिखाई पड़ता है यहां विपक्ष का उद्देश्य यह होता है कि  चुनावी वर्ष में जनता के मूड को अपनी ओर मोड़ना और सत्ता प्राप्त करना। 

अभिमत 
1 लोकतंत्रीय शासन में विपक्ष की भूमिका महत्व पूर्ण होती है। 
2 - यदि विपक्ष अपने पूरे  कार्य काल में सक्रिय रहे तो सरकार और नौकरशाही जनहित की ओर अग्रसर रहेगी। 

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

Pandit Ram Khelawan : The Great Social Activist

 [Blogger : Asharfi Lal Mishra ]

नाम :  राम खेलावन मिश्र

जन्म : मार्च 25, 1909   ,इंजुवारामपुर कानपुर।[1]

मृत्यु  : सितम्बर 02,1982 ,इंजुवारामपुर कानपुर।

राष्ट्रीयता : भारतीय

व्यवसाय: शिक्षक ,सामाजिक कार्यकर्ता

प्रसिद्धि कारण: प्रधान  ,सामाजिक कार्यकर्ता

जीवनसाथी : रेणुका देवी

बच्चे : तीन पुत्र

Ram Khelawan Mishra







राम खेलावन मिश्र

(जन्म मार्च 25.1909 --मृत्यु सितम्बर ०2,1982) जन्म से क्रन्तिकारी विचारों के थे। इनका जन्म ब्रिटिश साम्राज्य भारत के यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश ) के कानपुर जिले के ग्राम इंजुवारामपुर (इन्जुआरामपुर) में मार्च २५ ,१९०९ को हुआ। [1]a 

जीवन परिचय

इनके पिता नाम नन्हा था। वर्ष 1926 में इन्होने मिडिल स्कूल डेरापुर , कानपुर वर्तमान में डेरापुर, कानपुर देहात से वर्नाक्यूलर फाइनल परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष १९२७ में रेणुका देवी से विवाह हुआ। इसी वर्ष प्राइमरी स्कूलमें शिक्षक बने।

क्रांतिकारी

चूँकि यह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों के थे इसलिए शिक्षण कार्य में मन नहीं लगा और शिक्षण कार्य से त्याग पत्र देकर भारत में चल रही आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। वर्ष १९४२ में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध इनका जन जागरण अभियान बहुत उग्र था। गांव के समीप से जाने वाली उत्तरी रेलवे के किनारे टेलीफोन लाइन का लगभग २०० मीटर तार काट कर भूमिगत हो गए। इसी बीच जुरिया के शिवराम पाण्डेय ,बड़ागांव भिक्खी के शम्भू दयाल चतुर्वेदी और बहिरी उमरी के शिशुपाल सिंह और कठारा के जंग बहादुर सिंह आजादी के इस अभियान में कूद कर ब्रिटिश सरकार को ललकारा और रेलवे की संचार व्यवस्था ठप्प कर दी।[2]

समाज सेवा

1-गांव के तालाबों में जल भराव के लिए ग्रामीणों के सहयोग से तालाबों को गहरा कराया जिससे पशुओं के पीने एवं स्नान के लिए पानी की समस्या का निराकरण हुआ।

2- गांव में छोटे बच्चों की शिक्षा के लिए प्राथमिक पाठशाला खुलवाई गई।

3-भारत के स्वतंत्र होने पर ग्रामवासियों ने उन्हें सर्व सम्मति से प्रधान चुन लिया।[3] दूसरी बार भी ग्रामवासियों ने प्रधान बनाना चाहा परन्तु इन्होने अस्वीकार कर दिया।

4-गांव में अपने ही चबूतरे पर प्राथमिक पाठशाला का संचालन शुरू करवाया। इस चबूतरे को पंचायती चबूतरा कहा जाता था। 

स्वतन्त्रता दिवस पर सर्व प्रथम इसी चबूतरे पर तिरंगा फहराया गया था। बाद में इसी चबूतरे पर स्वतन्त्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोह आयोजित किये जाने लगे। 

मृत्यु

जनता की सेवा करते हुए २ सितम्बर १९८२ को उनका देहांत हो गया।

सोमवार, 13 सितंबर 2021

राजनीति का अधोगामी मुद्दा

                     ॐ 

लेखक : अशर्फी लाल मिश्र 

अशर्फी लाल मिश्र






   स्वतंत्रता पूर्व राजनीति  के मुद्दे दूसरे थे और स्वतंत्रता के बाद दूसरे हो गए। स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के बाद लगभग दो दशक तक राजनीति में समाज सेवा का मूल्य सर्वोपरि था। 

लगभग सातवें दशक (1960 -1970)  के उत्तरार्ध तक  राजनीति के मूल्यों में बदलाव आना प्रारम्भ हो गया। अब सत्ता प्राप्ति के हथकंडे प्रारम्भ हो गए। धीरे धीरे दशक 1990 -2000 में कुछ घटिया राजनीतिक हथकंडे अपनाये भी गए। इन घटिया राजनीति के मुद्दों ने  सत्ता के द्वार तो खोल दिए लेकिन राष्ट्र को जो  क्षति हुई उसकी पूर्ति आज तक संभव न हो सकी । 

आइये अब हम उस  घटिया राजनीतिक  मुद्दा " शिक्षा में  नकल को प्रोत्साहन "  पर चर्चा करेंगे:

शिक्षा में  नकल को प्रोत्साहन 

         नकल करना मानव प्रवृत्ति है। अच्छी नकल से अच्छे परिणाम और खराब नकल से खराब  परिणाम। करोड़पति  व्यक्ति भी यदि किसी दुर्व्यसन की नकल करता है तो खाकपति हो जाता है।  सामान्य व्यक्ति यदि लगनशील है तो वह भी  उच्च आदर्श को सामने रखकर  उच्च श्रेणी का वैज्ञानिक/ प्रोफेसर  बन सकता है। 

बच्चो में बूढ़ों की अपेक्षा नकल की प्रवृत्ति अधिक देखी  जाती है। 1965  के बाद धीरे धीरे  छात्रों में नकल की प्रवृत्ति का संचार होने लगा। कुछ शिक्षक भी नकल कराने में अपनी गरिमा समझने लगे। 

आइये आज हम उत्तर प्रदेश राज्य में छात्रों में बढ़ती नकल की प्रवृत्ति पर चर्चा करेंगे :

जब उत्तर प्रदेश में सहायता प्राप्त के साथ साथ मान्यता प्राप्त विद्यालयों का प्रचलन बढ़ा। इसी बीच  विद्यालय के प्रबंध तंत्रों  में छात्रों को अपने-अपने विद्यालय प्रवेश के लिए आकर्षित करने के लिए नकल  का सहारा लेना प्रारम्भ हुआ।  परिणाम यह हुआ कि मेधावी छात्र मेरिट में पीछे होने लगे और नकलची छात्र बोर्ड और विश्वविद्यालयों में  अपना स्थान बनाने में सफल होने लगे।  शिक्षा में हो रही इस धांधली  रोकने  के लिए वर्ष  1992 में तत्कालीन मुख्य मंत्री कल्याण सिंह ने नकल अध्यादेश लागू कर दिया।परिणाम यह  हुआ कि उस वर्ष यू  पी बोर्ड और राज्य  विश्वविद्यालयों के परीक्षा  परिणाम बहुत ही निराशा जनक रहे। नकल रुक गई थी और नकल द्वारा  अपना अस्तित्व कायम रखने वाले विद्यालयों में निराशा पैदा हो गई थी। 

छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा माफियाओं में छाये असंतोष के मनोविज्ञान को अध्यापक से राजनीति  में आने वाले राजनेता मुलायम सिंह यादव  दौड़ कर दोनों हाथों से लपक लिया। बस अब फिर क्या था चूँकि मुलायम सिंह यादव पहले शिक्षक  रहे थे  वह छात्रों में  नकल की प्रवृत्ति और अभिभावकों की में अच्छे अंक पाने की प्रवृत्ति से भली भांति परिचित थे। 

नकल  अध्यादेश लगने से जहां मुख्य मंत्री  कल्याण सिंह अपनी सफलता पर इठला रहे थे वहीं दूसरी ओर सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने नकल अध्यादेश निरस्त करने की घोषणा कर दी।  अब केवल अगले चुनाव की देरी थी। जब अगला चुनाव आया तो सपा के  घोषणा पत्र (manifesto) में नकल अध्यादेश निरस्त करने का भी उल्लेख किया किया गया तथा   मुलायम सिंह यादव ने अपनी चुनाव रैलियों में नकल अध्यादेश निरस्त करने एवं स्वकेंद्र  करने का  जनता को आश्वासन दिया। नकल अध्यादेश निरस्त करने  और स्व केंद्र करने के वायदे को  शिक्षा माफिया  ,छात्रों एवं अभिभावकों ने  जोरदार स्वागत किया।   बस फिर क्या था छात्र ,अभिभावक और शिक्षा माफिया गद -गद हो गए। इस प्रकार मुलायम सिंह यादव  उत्तर प्रदेश में सत्ता हथियाने में कामयाब रहे। 

नकल अध्यादेश निरस्त होने  के परिणाम 

नकल अध्यादेश निरस्त करने और स्वकेंद्र करने से  उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चौपट  हो गई। 

 उसके बाद से विद्यालयों,महाविद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति नगण्य हो गई। शिक्षक भी अनियमित हो गए।अब शिक्षण संस्थाएं केवल प्रवेश और  परीक्षा केंद्र के रूप में परिवर्तित हो गए। 

उसके बाद जितनी भी सरकारें आईं शिक्षा को पटरी पर लाने में  सफल नहीं  हो सकीं। मुलायम सिंह यादव  के इस  राजनीतिक मुद्दे को काटने  का  अब तक  किसी में साहस नहीं हुआ। 

 आज स्थिति यह है छात्र उन शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश चाहते हैं  जहां नकल की या परीक्षा परिणाम की गारंटी हो। आज प्राथमिक विद्यालयों में नाम लिखाने  के बाद अभिभावक अपने बच्चों को  निजी मान्यता रहित या मान्यता प्राप्त विद्यालयों में पढ़ाना चाहते है। 

मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक मुद्दे " नक़ल अध्यादेश समाप्त करने एवं स्वकेंद्र स्थापित करने " से भले ही सत्ता हथिया ली हो लेकिन उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने का श्रेय भी मुलायम सिंह यादव   को ही दिया जायेगा। आज तक उत्तर प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था पंगु है जिसे पटरी पर लाना टेढ़ी खीर है। 

--अशर्फी लाल मिश्र ,शिक्षाविद ,कवि एवं लेखक ।


अनर्गल बयानबाजी से कांग्रेस की प्रतिष्ठा गिरी

 ब्लॉगर : अशर्फी लाल मिश्र अशर्फी लाल मिश्र कहावत है कि हर ऊँचाई के बाद ढलान  होती है । ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने में कांग्रेस ने जनता ...