रविवार, 7 अप्रैल 2019

जातिवाद राजनीति का एक सशक्त अस्त्र

ब्लॉगर : अशर्फी लाल मिश्र

Asharfi Lal Mishra










भारतीय संविधान की  निर्माण समिति में  सभी जातियों /श्रेणियों के प्रतिनिधियों को इस लिए सम्मिलित किया गया था क़ि सभी के हितों का ध्यान रखा जाय और शायद इसीलिए अनुसूचित जातियों /अनुसूचित  जनजातियों को अन्य जातियों के  समकक्ष लाने  के उद्देश्य से  उनके आरक्षण की व्यवस्था भी 10 वर्ष  के लिए की गयी थी लेकिन आज तक आरक्षण की व्यवस्था कायम है। बाद में ओ  बी सी जातियों का भी आरक्षण कर दिया गया।  मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीब तबके के लिए भी  आरक्षण कर दिया। ऐसा लगता है कि भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना में आरक्षण प्रमुख बिंदु  है।

राजनेताओं की अभिरूचि  जातिवाद में 
 यद्यपि समाज में धीरे धीरे ऊँच -नीच का भेद भाव समाप्त हो रहा है समाज में सामाजिक समरसता बढ़ रही है। यात्रा के समय बस ,  रेलगाड़ी  या फिर  यान में , होटल /रेस्टोरेंट में, सार्जनिक समारोहों में ,देवालयों में ,सिनेमा घरों आदि  कहीं कोई जाति  नहीं पूँछता।  लेकिन  जब एक अनुसूचित जाति का   नेता अपना   नाम  मीडिया में  छपवाने  की गरज से जब झंडा लेकर समूह के साथ  मंदिर पहुँचता है और नारे लगाकर लौट जाता है और कहता है कि मुझे मंदिर में प्रवेश नहीं मिला। राजनेता का यह कार्य अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए था. 

जातिवादी विचार धारा को बनाये रखने के लिए राजनेता  इसकी जड़ों को कभी दूध और कभी पानी से सिंचित करते रहते हैं। चूँकि अधिकांश राजनेताओं का अभ्युदय  जातियों के गर्भ से होता है इसलिए अपने को  अपनी जाति का  सर्व श्रेष्ठ  नायक बनाये रखने  में अपनी भलाई समझते हैं। 

जातीय आधार पर चुनाव में टिकट का वितरण 
सांसद या विधायक के उम्मीदवार के लिए  न कोई शैक्षिक योग्यता और न ही कोई  अधिकतम उम्र का प्रतिबन्ध।  हाँ वह केवल  अपना हस्ताक्षर कर सकने में समर्थ हों । लोक  सेवकों के लिए अनिवार्य योग्यता , न्यूनतम और अधिकतम की उम्र का प्रतिबन्ध , मेडिकल सर्टिफिकेट की भी  आवश्यकता होती है लेकिन लोक सेवकों  पर निगरानी रखने वाले मंत्रियों के लिए कोई योग्यता  निर्धारित नहीं। झारखण्ड के एक मंत्री तो शपथ पत्र  भी नहीं पढ़ सके.  ये मंत्री जी अपने विभाग के सचिव के विश्वास पर ही चलेंगे। 

अब आप सोच सकते हैं  फिर उनकी योग्यता क्या निर्धारित है आइये अब बताते हैं कि लोक सभा या  विधान सभा चुनाव के  उम्मीदवार को  में निम्न योग्यताएं चाहिए..इन्हीं योग्यताओं को ध्यान में रखकर राजनीतिक दल टिकट वितरण करते हैं -

1- उसकी जाति  
2- उसकी जाति  के मतदाताओं  की संख्या 
3- अपनी जाति के मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने की क्षमता 
4- आर्थिक क्षमता 
5-सामाजिक प्रसिद्धि /उच्च घराना 
6- सीट निकलने की क्षमता 

राजनेताओं की मानसिकता 

किसी जाति  विशेष का मत पाने के लिए  सदैव उसके आरक्षण की अनंतकाल  तक  बनाये रखने की बात करते है या उसके संरक्षण से सम्बंधित कानूनों के पोषण की बात करते हैं।  

समाज में जाति  आधारित आरक्षण का लाभ उठाने वाले   लोग अपने हित  में बने कानून के पक्षधर हैं अर्थात जातीय आरक्षण त्यागना नहीं चाहते लेकिन समाज में उनका कहना है  सभी बराबर हैं। जब सभी बराबर हैं  तो किसी को  आरक्षण क्यों। 

प्रश्न यह है कि जब समाज में समरसता कायम हो रही है या हो गयी है तो चुनाव के अवसर पर राजनेता जातीय सम्मलेन क्यों करते हैं. वे अपनी जाति- बहुल क्षेत्र  के लोगों में जातीय  सन्देश क्यों देते हैं। जातीय राजनीति पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं ?[1] 

कुछ जातिवादी  प्रमुख राजनेता 

1- मायावती 
2- मुलायम सिंह यादव 
3 लालू प्रसाद यादव -
 उत्तर प्रदेश की राजनीति  में मायावती और मुलायम सिंह यादव  जातीय राजनीति में महारथ राजनेता  हैं। वहीँ बिहार की राजनीति में  लालू प्रसाद यादव का नाम प्रमुख है। ये राजनेता अपनी जाति का रिमोट अपने पास होने का दावा करते हैं। 

लीक से हटकर राजनेता 
कुछ राजनेता ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी जाति  से हटकर भी राजनीति  की और  प्रांतीय  राजनीति में अपना लोहा मनवाया जैसे जयललिता।  जयललिता तमिलनाडु की लोकप्रिय मुख्यमंत्री और  संसद में भी उनकी  पार्टी की सदैव पूंछ रही। 
     
                                                                       
                                                                    जयललिता 
                                                               

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