ब्लॉगर : अशर्फी लाल मिश्र
सोमवार, 13 मार्च 2023
सोमवार, 30 जनवरी 2023
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग
-- अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
भारत एक लोकतांत्रिक देश है यहाँ प्रत्येक भारतीय नागरिक को सरकार की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त है ।
परन्तु देखने मेरे आ रहा है कि कुछ राजनेता जब सरकार की आलोचना करते करते थक जाते हैँ या उन्हें आलोचना करने का कोई उचित विषय नहीँ मिलता तब उनकी दृष्टि भारत में सृजित साहित्य की ओर जाती है ।
साहित्य समाज का दर्पण है
भाषा कोई भी हो लेकिन उस भाषा में सृजित साहित्य समाज का या तो साक्षात्कार कराता है या फिर उसकी भाषा अलंकारिक हो जाती है लेकिन उसका उद्देश्य कल्याणकारी ही होता है । समग्र रूपेण हम कहना चाहेंगे कि साहित्य तत्कालीन समाज का प्रत्यक्ष दर्शन कराता है । साहित्य सृजन स्वतंत्र होता है जब कि इतिहास लेखन सत्ता से प्रेरित एवं उसके सापेक्ष होता है।
साहित्य की आलोचना
किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर ग्रंथों के रूप में ही संरक्षित होती है और उनके माध्यम से ही प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का हमें ज्ञान होता है। प्राचीन ग्रंथ हमें प्राचीन संस्कृति का ज्ञान कराते है।
ग्रंथ हमारी राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर हैं उनकी आलोचना करना राष्ट्र की आलोचना के समान हैँ ।
इधर देखने में आ रहा है कि कुछ दिग्भ्रमित राजनेता वोट बैंक को दृष्टिकोण में रखकर विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस की कटु आलोचना करने से नहीं चूके । रामचरितमानस हिन्दी हिन्दीसाहित्य का न केवल महाकाव्य बल्कि लोकग्रन्थ भी है उसकी आलोचना करना लोक / राष्ट्र का अनादर भी है । इन राज नेताओं यहाँ तक कहना कि कुछ अंश हटा दिया जाय तब वह ग्रन्थ उसी प्रकार अधूरा हो जायेगा जैसे किसी के चेहरे से उसकी नाक काट कर अलग कर दी जाय और फिर उसके चेहरे को देखा जाय ।
बौद्ध धर्मावलंबी स्वामीप्रसाद मौर्य [1 ]और चन्द्र शेखर यादव[2] की रामचरितमानस पर छुद्र टिप्पणी खेद जनक है ।
मानस की महत्ता
रामचरितमानस की महत्ता किसी के आलोचना करने से भी कम नहीं हो सकती । रामचरितमानस न केवल महाकाव्य है बल्कि एक ऐसा लोकग्रंथ है जो हर व्यक्ति के दिल में समाया हुआ है।
मानस एक ऐसा ग्रंथ है जिसकी प्रत्येक पंक्ति समाज को दिशा देती है । इसकी महत्ता इसी बात से जानी जा सकती है कि मुगल काल और ब्रिटिश काल मे जब आम जनता त्रस्त और व्याकुल थी , तब मानस से ही उसे समाज धर्म का एवं कर्तव्य का बोध होता था ।
हाँ यदि किसी में सामर्थ्य है तो रामचरितमानस से उत्कृष्ट कोटि का महाकाव्य जनता को पढ़ने के लिए उपलब्ध कर सकता है ।
सामाजिक ताना बाना छिन्न भिन्न करने का कुत्सित प्रयास
इधर देखने में आ रहा है कि कुछ राजनेता समाज में विद्वेष फैलाकर जातीय संघर्ष कराना चाह रहे हैँ, यह लोकतंत्र का सबसे घृणित रूप है । आजादी के 76 वर्ष बाद देश में जातिवादी विषमता की जो खाई धीरे धीरे समापन की ओर जा रही थी , उसे सत्ता के लोभी ,सामाजिक समरसता के विध्वंसक राजनेता समाज में जातिवाद की जड़ों को पुनः सिंचित करने लगते हैं। इन्हे समाज सेवक न कह कर समाज भंजक कहना चाहिए। ऐसे सत्ता लोभी, समाज भंजक राजनेताओं को जब कुछ नहीं मिला तो अपनी भारतीय सांस्कृतिक धरोहर पर ही हमला करना शुरू कर दिया ।
विश्व में सभी धर्मों के लोग अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए सदैव प्रयास रत रहते हैं लेकिन अफसोस है भारतीय लोकतन्त्र में कुत्सित मानसिकता एवं सत्ता लोभ के कारण कुछ सिरफिरे राजनेता भारतीय संस्कृति पर हमला करने से नहीं चूक रहे हैं।
अभिमत
1- राज नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखने वाले ग्रंथों की आलोचना करने से अपने को दूर रखें।
2- रामचरितमानस जैसे ग्रंथों की आलोचना से जनता में जातीय संघर्ष की भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र
सोमवार, 9 जनवरी 2023
जातीय जनगणना राष्ट्रीय प्रगति में बाधक
ब्लॉगर - अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
आज जन संख्या की दृष्टि से भारत का स्थान विश्व में प्रथम है।[a]
सजग लोगों ने स्वयं ही अपने परिवार को सीमित कर लिया जब कुछ जातियों के लोग जनसंख्या को वोट बैंक मानते रहे ।उनका तर्क रहा कि जनसंख्या के अनुपात में सत्ता एवं आरक्षण में भागीदारी सुनिश्चित होगी। ऐसे लोग ही सदैव जातीय जनगणना की मांग कर रहे है।
कभी समाज में जातीय भेद भाव था परन्तु आज यही जातीय भेद भाव राजनीति का सशक्त अस्त्र बन गया है । संविधान की मूल भावना है कि समाज में जातीय विषमता की खाई धीरे धीरे समाप्त हो । आज सार्वजनिक स्थानों पर कहीं भी जातीय विषमता या भेद भाव नजर नहीं आता है । हाँ आर्थिक विषमता अवश्य है
छोटा परिवार सुख का आधार
एक समय था जब यह माना जाता था कि अधिक जनसंख्या भी देश की गरीबी का एक कारण है अतः सरकार का नारा था कि " छोटा परिवार सुख का आधार "
इस स्लोगन की ओर शिक्षित लोगों का ध्यान गया और वे इस ओर अग्रसर भी हुए जो बाद में समाज में नव समृद्ध हो गए। इसके विपरीत कुछ लोग वोट बैंक समृद्धि के लिहाज से या यों कहिए सत्ता पाने के उद्देश्य से बड़ा परिवार शक्ति का आधार मानते रहे।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में समाज की दो धाराऐं चल पड़ीं:
1-छोटा परिवार सुख का आधार
2- बड़ा परिवार शक्ति का आधार
दूसरे स्लोगन ,"बड़ा परिवार शक्ति का आधार " को अपनाने वाले लोग आज समाज में आर्थिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े गये लेकिन वोट बैंक की शक्ति के आधार पर सत्ता में, प्रशासन में भागीदारी चाहते हैं ऐसे लोग ही भारत में जातीय जन गणना चाहते हैं।
जातीय जनगणना विकास में बाधक
1-स्वतंत्रता के बाद जिन जातियों को वोट बैंक माना गया वे सभी जातियां आज आर्थिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं। उदाहरण के लिए अल्प संख्यक (मुस्लिम सुन्नी वर्ग) , अनुसूचित (जाटव को छोड़कर) एवं अनुसूचित जनजाति।
2- जहां बात ओबीसी की आती है उसमें कुछ जातियां जैसे अहीर (यादव, ग्वाला), कुर्मी (कटियार, सचान, गंगवार,पटेल) बहुत ही हर दृष्टि से समुन्नत हैं लेकिन आरक्षण के कारण ये जातियां भी जातीय जनगणना की समर्थक है।
3-सत्ता और प्रशासन में भागीदारी की भावना (आरक्षण) के कारण प्रत्येक व्यक्ति बड़े परिवार को बढ़ावा देगा जिससे देश की प्रगति अवरुद्ध होगी ।
4- बड़े परिवार को प्रोत्साहन मिलेगा,देश का विकास अवरूद्ध होगा, गरीबी बढ़ेगी।
जातीय जनगणना तकनीकी दृष्टि से मुश्किल कार्य
1-आज कस्बों और नगरों में रहने वालों की असली जाति का पता लगाना लोहे के चने चबाना है ।
2- आज लोग अपने मूल स्थान से बाहर कहीं निवास करने पर अपनी जाति बदल कर निवास कर हैं।
3- आरक्षण का लाभ पाने के लिए लोग अपनी जाति बदल रहे हैं।
4- अब हम कुछ बदली जातियों के उदाहरण दे हैं जैसे:
अ - चौहान - सामान्य और अनूसूचित दोनों लिखते हैं।
ब - राठौर - सामान्य और पिछड़े वर्ग के लोग लिखते हैं।
स - गौतम - सामान्य और अनूसूचित दोनों लिखते हैं।
द - गोयल - सामान्य और अनूसूचित दोनों लिखते हैं।
इ शर्मा - सामान्य और पिछड़े वर्ग के लोग लिखते हैं।
आदि आदि अनेक शब्द बहु जाति सूचक हैं।
महा नगरों में जाति का पता लगाना मुश्किल
एक नगर से दूसरे नगर में निवास करने पर एकल परिवार की जाति का पता लगाना मुश्किल कार्य।
जाति का प्रमाणीकरण
अब प्रश्न उठता है कि जाति का प्रमाणीकरण कौन करेगा ? गांवों में प्रधान , लेखपाल आदि तो क्या इसमें भ्रष्टाचार नहीं होगा?
कस्बों, नगरों , महानगरों में सभासद, विधायक , सांसद जाति प्रमाणित करेंगे तो क्या उक्त सभी लोग सब लोगों की जाति से परिचित हैं ।निश्चित ही जाति प्रमाणीकरण में घोर भ्रष्टाचार संभावित है।
Updated on 11/01/2023
बिहार में जातीय जनगणना
बिहार में जातीय जनगणना प्रारम्भ हो गई जिसकी रोक के लिए 11 जनवरी 2023 को S C में याचिका दाखिल हुई ।[1]
अभिमत
1- जनसंख्या की गणना में आर्थिक , शैक्षिक पहलू एवं व्यवसाय शामिल किया जाना चाहिए।
2- जातीय जनगणना राष्ट्रीय विकास में बाधक होगी।
3- आरक्षित वर्ग में समुन्नत जातियों को रेखांकित किया जाना चाहिए।
4- राजनीति भी व्यवसाय है अतः व्यवसाय में राजनीति भी लिखी जानी चाहिए ।
Author -Asharfi Lal Mishra
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022
सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाना राजनीतिक अदूरदर्शिता
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर।
| अशर्फी लाल मिश्र |
राज्य सरकार या केंद्र सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों की सेवा निवृत्ति आयु को बढ़ाने का अधिकार तो है लेकिन बिना राष्ट्रीय हानि लाभ का आकलन किए कर्मचारियों की सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाना अदूरदर्शिता होगी।
सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाने से हानियाँ
1- 60 वर्ष की आयु के बाद शारीरिक क्षमता में कमी आ जाती है अतः हर कर्मचारी आगे सेवा नहीं करना चाहता।
2- फील्ड या बॉर्डर या फिर उंचाई पर कार्य प्रभावित होगा।
3- पेंशन में वृद्धि के लालच में कर्मचारी स्वेच्छा से सेवा निवृत्त नहीं होना चाहते।
4-जिंक फूड एवं फास्ट फूड के प्रचलन के कारण कर्मचारियों में शारीरिक मोटापा बढ़ रहा है जिसके कारण भी कर्मचारियों में कार्य क्षमता कम हो रही है।
5- लगभग 10 % कर्मचारी ही शारीरिक रूप से फिट रहते है उन्हें आगे काम का अवसर दिया जा सकता है।
6- कम क्षमता के कर्मचारियों की सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाने से राष्ट्रीय क्षति होगी।
7- रोजगार पाने की पंक्ति में खड़ी युवा पीढ़ी में भी असन्तोष फैलेगा।
8-विपक्ष को एक राजनीतिक अवसर उपलब्ध होगा।
लाभ
1- सेवा निवृत्त कर्मचारियों को GPF एवं ग्रेच्युटी का भुगतान न करने से सरकार को वित्तीय राहत मिलेगी।
2-कुछ अनुभवी एवं कर्मठ कर्मचारियों का भी लाभ मिलेगा।
ओपिनियन
1-सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाना राजनीतिक अदूरदर्शिता होगी।
2- सेवा निवृत्ति बढ़ाने से राष्ट्रीय क्षति होगी।
3-रोजगार पाने की पंक्ति में खड़ी युवा पीढ़ी में असंतोष फैलेगा।
4- विपक्ष को एक राजनीतिक मुद्दा मिलेगा।
शुक्रवार, 17 जून 2022
अग्निपथ योजना का विश्लेषण
--अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
Updated on 03/01/2023
मोदी सरकार की अग्निपथ योजना का संक्षिप्त विश्लेषण निम्न्वत है:
1-अनिवार्य सैनिक सेवा
आज सारा विश्व परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ा हुआ है ।कोई भी देश पूर्ण रूपेण आत्म निर्भर नहीँ है ।आज व्यापार भी परमाणु धमकी से प्रभावित हो रहा है। कब कौन देश किस देश को अपने शिकंजे में जकड़ ले कहा नहीँ जा सकता।
आज हर देश की सीमाएँ सदैव खतरे में ही रहती हैँ । इसी खतरे को ध्यान में रखते हुए विश्व के कई देशों ने अपने यहाँ अनिवार्य सैनिक सेवा लागू कर दी । इनमें प्रमुख देश हैँ इजराइल, रूस, ब्राजील,उत्तरी कोरिया, दक्षिण कोरिया आदि ।
कुछ ऐसे भी देश हैं जहाँ महिलाओं के लिए भी अनिवार्य सैनिक सेवा है । जैसे इजराइल ।
अग्निपथ योजना से स्पष्ट संकेत मिल रहा है कि भारत भी अनिवार्य सैनिक सेवा के लक्ष्य की ओर अग्रसर होना चाहता है। वर्तमान परिस्थितियों में अग्निपथ योजना उत्तम है लेकिन इस योजना के कार्यान्वयन से पूर्व इसकी महत्ता एवं आवश्यकता का जनता में प्रचार प्रसार किया जाना जरूरी था।
2-बढ़ती वरिष्ठ नागरिकों की आवादी
देश में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसी के साथ कार्यरत कर्मचारियों की तुलना में पेंशनरों की संख्या में भी वृद्धि होती जा रही है।
कहने का अर्थ यह है एक तरफ जहाँ भारत बूढ़ा हो रहा है तो दूसरी तरफ युवा शक्ति में कमी आ रही है । इसका अर्थ आप यह भी लगा सकते हैं कि खर्चा अधिक आय कम।
3-बढ़ता वित्तीय असंतुलन
वर्तमान में रक्षा बजट का लगभग 83% वेतन एवं पेंशन पर खर्च हो जाता है [a] रही बात शेष बजट से सेना का आधुनिकीकरण करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
ऐसा प्रतीत होता है कि इस अग्निपथ योजना के माध्यम से पेंशन में खर्च होने वाला बजट सेना के आधुनिकीकरण के काम आयेगा।
4-लाभ
(1)धीरे धीरे देश अनिवार्य सैनिक सेवा की ओर अग्रसर होगा।
(2) पेंशन न देने के कारण बचत का बजट सेना के आधुनकीकरण में काम आयेगा।
योजना का विरोध
नवयुवकों द्वारा अग्निपथ का विरोध जिस ढंग से किया जा रहा है वह निंदनीय है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, आगजनी करना , आवागमन बाधित करना जैसे कार्य राष्ट्र विरोधी हैं।
अभिमत
(1 ) सेना से अवमुक्त अग्निवीरों को केन्द्रीय असैनिक बलों / प्रांतीय सशस्त्र पुलिस में कुछ पद आरक्षित किए जा सकते हैं।
(2) सेना से अवमुक्त अग्निवीरों को केन्द्र/राज्य की सेवाओं में कुछ वेटेज अंक भी दिए जा सकते हैं जैसे NCC के लिए वेटेज अंक दिए जाते हैं।
(3) नवयुवकों द्वारा इस योजना का विरोध करने का तरीका अनुचित एवं निंदनीय।
(4) अग्निवीरों को राज्यों में होम गार्ड सेवा में वरीयता दी जानी चाहिए।
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022
गार्गी : एक महान दार्शनिक
--अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
जब जब वैदिक कालीन दार्शनिकों ,विद्वानों एवं तत्व वेत्ताओं का उल्लेख होता है तब तब महिला विद्वानों में ब्रह्मवादिनी कन्या गार्गी का उल्लेख सर्वोपरि होता है। गार्गी, गर्गवंशीय वचक्नु नामक ऋषि की पुत्री थी और नाम रखा गया " वाचकन्वी गार्गी "। गार्गी का जन्म लगभग 700 ईसा पूर्व माना जाता है।
विदुषी गार्गी ने एक बार तात्विक वाद विवाद में ऋषि याज्ञवल्क्य को भी निरुत्तर कर दिया था। ऋषि याज्ञवल्क्य अपने समय के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक माने जाते थे और आज भी। गार्गी ने न केवल वैदिक वाद विवाद में ख्याति प्राप्त की अपितु वेदों की ऋचाओं के लिखने भी अमूल्य योगदान किया।
ऋषि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां थी कात्यायनी और मैत्रेयी। कात्यायनी गृहस्थ महिला थी जब कि मैत्रेयी विदुषी , तत्व वेत्ता एवं अपने पति द्वारा रचित वेदों की ऋचाओं को लिपिवद्ध करने में सहायता करती थी। अतः ऋषि याज्ञवल्क्य मैत्रेयी का बहुत अधिक आदर करते थे।
देवी के रूप में गार्गी की पूजा
चूँकि ऋषि याज्ञवल्क्य अपनी पहली पत्नी कात्यायनी की तुलना में दूसरी पत्नी मैत्रेयी का बहुत आदर करते थे इसलिए कात्यायनी ,मैत्रेयी से मन ही मन ईर्ष्या करने लगी। एक दिन ऐसा आया कि वाचकन्वी गार्गी शास्त्रार्थ के लिए ऋषि याज्ञवल्क्य के आश्रम आ पहुंची। शास्त्रार्थ में गार्गी ने ऋषि याज्ञवल्क्य को निरुत्तर कर दिया। इस घटना से कात्यायनी अति प्रसन्न हुईं और वाचकन्वी गार्गी की भूरि भूरि प्रशंसा की।
![]() |
| गार्गी -याज्ञवल्क्य संवाद |
कात्यायनी ,ऋषि कात्यायन की पुत्री थीं। कात्यायनी ने याज्ञवल्क्य को निरुत्तर करने देने वाली गार्गी की प्रशंसा का सन्देश अपने पिता कात्यायन भेजा। चूँकि बेटी का सम्मान ससुराल में कम था इसलिए याज्ञवल्क्य के पराजित होने पर कात्यायन ऋषि अति प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने कात्यायन गोत्र (वंश )के लोगों को विदुषी गार्गी का सार्वजानिक रूप में सम्मान करने को कहा. तब से आज तक कात्यायन गोत्रीय (मिश्र ) लोग विदुषी गार्गी का सम्मान करते आ रहे हैँ. कालांतर में विदुषी गार्गी के सम्मान के स्थान पर देवी के रूप में पूजा होने लगी जो आज तक हो रही है.यह पूजा वर्ष में दो बार होती है पहली पूजा चैत्र मास में बासंती नवरात्रि के बाद त्रयोदशी को और दूसरी पूजा आश्विन मास में शारदीय नवरात्रि के बाद त्रयोदशी को की जाती है.
कात्यायन गोत्रीय मिश्र, नव देवियों की ही भांति गार्गी देवी की पूजा करते हैँ. और इस अवसर पर अपने बच्चों के कर्ण भेदन, मुंडन आदि संस्कार भी आयोजित करते हैँ.
वाचकन्वी गार्गी आजन्म अविवाहित रहीं.
--अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर.
गुरुवार, 9 दिसंबर 2021
भारतीय लोकतंत्र में मीडिया की कमजोर भूमिका
ब्लॉगर : अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
मीडिया (प्रिंट/वेब ,इलेक्ट्रॉनिक या सोशल ) लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ है।
मीडिया लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ है जिसका दायित्व है जनहित की पहरेदारी।
लोकतंत्र के प्रमुख अंग
(a) व्यवस्थापिका
(b ) कार्यपालिका
(c ) न्यायपालिका
एवं मीडिया को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ कहा जाता है।
मीडिया का दायित्व
इस डिजिटल युग में मीडिया का दायित्व बहुत ही चुनौती पूर्ण है। मीडिया का कार्य है जनहित की पहरेदारी। अब प्रश्न उठता है की जनहित कहाँ कहाँ प्रभावित होता है। जनहित लोकतंत्र में किसी भी स्थान में प्रभावित हो सकता है।
रिपोर्टिंग एक जोखिम भरा कार्य होता है जो हर व्यक्ति नहीं कर सकता।
सर्वे गुणः कांचन माश्रयन्ति
उक्ति सूक्ति का अर्थ है कि सोने में सभी गुण होते हैं। हमारा यहाँ कहने का अर्थ यह है कि धन सबको प्रभावित करता है। शासन का कोई भी तंत्र क्यों न हो अधिकांशतः धन से प्रभावित हो जाते हैं कोई कम कोई अधिक और जो प्रभावित नहीं होते उनकी संख्या अँगुलियों से गिनी जा सकती है।
मीडिया पूर्णतया निष्पक्ष नहीं
मीडिया में हम प्रिंट /वेब मीडिया,इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया को ले सकते हैं. मीडिया के ये सभी ही अंग किसी न किसी राजनीतिक दल से प्रभावित रहते हैं। इसमें सोशल मीडिया पूर्ण रूपेण अनियंत्रित है रही बात प्रिंट/वेब मीडिया की बात यह भी ये भी पूर्णतया निष्पक्ष नहीं हैं यह संस्थाएं या तो किसी राजनीतिक दल या फिर अप्रत्यक्ष फंडिंग से प्रभावित रहते हैं।
रही बात रिपोर्टिंग की तो कुछ रिपोर्टर निश्चित रूप से जोखिम भरा एवं सराहनीय कार्य करते हैं लेकिन कुछ रिपोर्टर विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र के घटिया रिपोर्टिंग करते हैं जो प्रत्यक्ष /अप्रत्यक्ष रूप से फंडिंग से प्रभावित रहते हैं। ब्यूरोक्रेसी तो घटिया रिपोर्टिंग से प्रभावित रहती है लेकिन जनप्रतिनिधि भी बिना प्रभावित हुए नहीं रहते। प्रिंट/वेब मीडिया या फिर सोशल मीडिया में हर कोई अपनी प्रशंसा का भूखा रहता है इस मानव प्रवृति के कारण कमजोर मानसिकता के लोग अपने स्थान /अपनी गरिमा को भूल जाते हैं।
ओपिनियन
1 - वर्तमान समय में पत्रकारिता में डिप्लोमा /उपाधि उप्लब्ध हैं अतः पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों को ही रिपोर्टिंग का काम सौंपा जाय।
शनिवार, 23 अक्टूबर 2021
लोकतंत्र और विपक्ष
बुधवार, 20 अक्टूबर 2021
Pandit Ram Khelawan : The Great Social Activist
[Blogger : Asharfi Lal Mishra ]
नाम : राम खेलावन मिश्र
जन्म : मार्च 25, 1909 ,इंजुवारामपुर कानपुर।[1]
मृत्यु : सितम्बर 02,1982 ,इंजुवारामपुर कानपुर।
राष्ट्रीयता : भारतीय
व्यवसाय: शिक्षक ,सामाजिक कार्यकर्ता
प्रसिद्धि कारण: प्रधान ,सामाजिक कार्यकर्ता
जीवनसाथी : रेणुका देवी
बच्चे : तीन पुत्र
![]() |
| Ram Khelawan Mishra |
राम खेलावन मिश्र
(जन्म मार्च 25.1909 --मृत्यु सितम्बर ०2,1982) जन्म से क्रन्तिकारी विचारों के थे। इनका जन्म ब्रिटिश साम्राज्य भारत के यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश ) के कानपुर जिले के ग्राम इंजुवारामपुर (इन्जुआरामपुर) में मार्च २५ ,१९०९ को हुआ। [1]a
जीवन परिचय
इनके पिता नाम नन्हा था। वर्ष 1926 में इन्होने मिडिल स्कूल डेरापुर , कानपुर वर्तमान में डेरापुर, कानपुर देहात से वर्नाक्यूलर फाइनल परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष १९२७ में रेणुका देवी से विवाह हुआ। इसी वर्ष प्राइमरी स्कूलमें शिक्षक बने।
क्रांतिकारी
चूँकि यह बचपन से ही क्रांतिकारी विचारों के थे इसलिए शिक्षण कार्य में मन नहीं लगा और शिक्षण कार्य से त्याग पत्र देकर भारत में चल रही आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। वर्ष १९४२ में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध इनका जन जागरण अभियान बहुत उग्र था। गांव के समीप से जाने वाली उत्तरी रेलवे के किनारे टेलीफोन लाइन का लगभग २०० मीटर तार काट कर भूमिगत हो गए। इसी बीच जुरिया के शिवराम पाण्डेय ,बड़ागांव भिक्खी के शम्भू दयाल चतुर्वेदी और बहिरी उमरी के शिशुपाल सिंह और कठारा के जंग बहादुर सिंह आजादी के इस अभियान में कूद कर ब्रिटिश सरकार को ललकारा और रेलवे की संचार व्यवस्था ठप्प कर दी।[2]
समाज सेवा
1-गांव के तालाबों में जल भराव के लिए ग्रामीणों के सहयोग से तालाबों को गहरा कराया जिससे पशुओं के पीने एवं स्नान के लिए पानी की समस्या का निराकरण हुआ।
2- गांव में छोटे बच्चों की शिक्षा के लिए प्राथमिक पाठशाला खुलवाई गई।
3-भारत के स्वतंत्र होने पर ग्रामवासियों ने उन्हें सर्व सम्मति से प्रधान चुन लिया।[3] दूसरी बार भी ग्रामवासियों ने प्रधान बनाना चाहा परन्तु इन्होने अस्वीकार कर दिया।
4-गांव में अपने ही चबूतरे पर प्राथमिक पाठशाला का संचालन शुरू करवाया। इस चबूतरे को पंचायती चबूतरा कहा जाता था।
स्वतन्त्रता दिवस पर सर्व प्रथम इसी चबूतरे पर तिरंगा फहराया गया था। बाद में इसी चबूतरे पर स्वतन्त्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के समारोह आयोजित किये जाने लगे।
मृत्यु
जनता की सेवा करते हुए २ सितम्बर १९८२ को उनका देहांत हो गया।
सोमवार, 13 सितंबर 2021
राजनीति का अधोगामी मुद्दा
ॐ
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
स्वतंत्रता पूर्व राजनीति के मुद्दे दूसरे थे और स्वतंत्रता के बाद दूसरे हो गए। स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के बाद लगभग दो दशक तक राजनीति में समाज सेवा का मूल्य सर्वोपरि था।
लगभग सातवें दशक (1960 -1970) के उत्तरार्ध तक राजनीति के मूल्यों में बदलाव आना प्रारम्भ हो गया। अब सत्ता प्राप्ति के हथकंडे प्रारम्भ हो गए। धीरे धीरे दशक 1990 -2000 में कुछ घटिया राजनीतिक हथकंडे अपनाये भी गए। इन घटिया राजनीति के मुद्दों ने सत्ता के द्वार तो खोल दिए लेकिन राष्ट्र को जो क्षति हुई उसकी पूर्ति आज तक संभव न हो सकी ।
आइये अब हम उस घटिया राजनीतिक मुद्दा " शिक्षा में नकल को प्रोत्साहन " पर चर्चा करेंगे:
शिक्षा में नकल को प्रोत्साहन
नकल करना मानव प्रवृत्ति है। अच्छी नकल से अच्छे परिणाम और खराब नकल से खराब परिणाम। करोड़पति व्यक्ति भी यदि किसी दुर्व्यसन की नकल करता है तो खाकपति हो जाता है। सामान्य व्यक्ति यदि लगनशील है तो वह भी उच्च आदर्श को सामने रखकर उच्च श्रेणी का वैज्ञानिक/ प्रोफेसर बन सकता है।
बच्चो में बूढ़ों की अपेक्षा नकल की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है। 1965 के बाद धीरे धीरे छात्रों में नकल की प्रवृत्ति का संचार होने लगा। कुछ शिक्षक भी नकल कराने में अपनी गरिमा समझने लगे।
आइये आज हम उत्तर प्रदेश राज्य में छात्रों में बढ़ती नकल की प्रवृत्ति पर चर्चा करेंगे :
जब उत्तर प्रदेश में सहायता प्राप्त के साथ साथ मान्यता प्राप्त विद्यालयों का प्रचलन बढ़ा। इसी बीच विद्यालय के प्रबंध तंत्रों में छात्रों को अपने-अपने विद्यालय प्रवेश के लिए आकर्षित करने के लिए नकल का सहारा लेना प्रारम्भ हुआ। परिणाम यह हुआ कि मेधावी छात्र मेरिट में पीछे होने लगे और नकलची छात्र बोर्ड और विश्वविद्यालयों में अपना स्थान बनाने में सफल होने लगे। शिक्षा में हो रही इस धांधली रोकने के लिए वर्ष 1992 में तत्कालीन मुख्य मंत्री कल्याण सिंह ने नकल अध्यादेश लागू कर दिया।परिणाम यह हुआ कि उस वर्ष यू पी बोर्ड और राज्य विश्वविद्यालयों के परीक्षा परिणाम बहुत ही निराशा जनक रहे। नकल रुक गई थी और नकल द्वारा अपना अस्तित्व कायम रखने वाले विद्यालयों में निराशा पैदा हो गई थी।
छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा माफियाओं में छाये असंतोष के मनोविज्ञान को अध्यापक से राजनीति में आने वाले राजनेता मुलायम सिंह यादव दौड़ कर दोनों हाथों से लपक लिया। बस अब फिर क्या था चूँकि मुलायम सिंह यादव पहले शिक्षक रहे थे वह छात्रों में नकल की प्रवृत्ति और अभिभावकों की में अच्छे अंक पाने की प्रवृत्ति से भली भांति परिचित थे।
नकल अध्यादेश लगने से जहां मुख्य मंत्री कल्याण सिंह अपनी सफलता पर इठला रहे थे वहीं दूसरी ओर सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने नकल अध्यादेश निरस्त करने की घोषणा कर दी। अब केवल अगले चुनाव की देरी थी। जब अगला चुनाव आया तो सपा के घोषणा पत्र (manifesto) में नकल अध्यादेश निरस्त करने का भी उल्लेख किया किया गया तथा मुलायम सिंह यादव ने अपनी चुनाव रैलियों में नकल अध्यादेश निरस्त करने एवं स्वकेंद्र करने का जनता को आश्वासन दिया। नकल अध्यादेश निरस्त करने और स्व केंद्र करने के वायदे को शिक्षा माफिया ,छात्रों एवं अभिभावकों ने जोरदार स्वागत किया। बस फिर क्या था छात्र ,अभिभावक और शिक्षा माफिया गद -गद हो गए। इस प्रकार मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में सत्ता हथियाने में कामयाब रहे।
नकल अध्यादेश निरस्त होने के परिणाम
नकल अध्यादेश निरस्त करने और स्वकेंद्र करने से उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गई।
उसके बाद से विद्यालयों,महाविद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति नगण्य हो गई। शिक्षक भी अनियमित हो गए।अब शिक्षण संस्थाएं केवल प्रवेश और परीक्षा केंद्र के रूप में परिवर्तित हो गए।
उसके बाद जितनी भी सरकारें आईं शिक्षा को पटरी पर लाने में सफल नहीं हो सकीं। मुलायम सिंह यादव के इस राजनीतिक मुद्दे को काटने का अब तक किसी में साहस नहीं हुआ।
आज स्थिति यह है छात्र उन शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश चाहते हैं जहां नकल की या परीक्षा परिणाम की गारंटी हो। आज प्राथमिक विद्यालयों में नाम लिखाने के बाद अभिभावक अपने बच्चों को निजी मान्यता रहित या मान्यता प्राप्त विद्यालयों में पढ़ाना चाहते है।
मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक मुद्दे " नक़ल अध्यादेश समाप्त करने एवं स्वकेंद्र स्थापित करने " से भले ही सत्ता हथिया ली हो लेकिन उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने का श्रेय भी मुलायम सिंह यादव को ही दिया जायेगा। आज तक उत्तर प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था पंगु है जिसे पटरी पर लाना टेढ़ी खीर है।
--अशर्फी लाल मिश्र ,शिक्षाविद ,कवि एवं लेखक ।
शुक्रवार, 9 जुलाई 2021
इक दिन ऐसा आयेगा , पानी पेट्रोल बन जायेगा।
द्वारा : अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
इक दिन ऐसा आयेगा,
पानी पेट्रोल बन जायेगा।
यों तो कहने में ज़रा अटपटा लग रहा है कि भविष्य में पेट्रोल -डीजल की भांति भूमि जल पर भी सरकार का पूर्ण या आंशिक नियंत्रण हो जाने की पूर्ण संभावना है लेकिन जो वर्तमान में परिस्थितियां बन रही हैं या दिखाई दे रही हैं उनसे साफ साफ़ परिलक्षित होता है कि भविष्य में भूजल पर भी किसी न किसी रूप में सरकारी नियंत्रण अवश्य होगा। अब आगे हम उन परिस्थितियों पर दृष्टिपात करेंगे :
1 -वर्षा कम होना
2 -जल संचयन के लिए तालाबों का गहरा न होना।
3- बहुत से तालाब अतिक्रमण के कारण अपने छोटे आकर में।
4- बहुत से तालाब खेतों में परिवर्तित हो गये।
3 - भूमि जल के रिचार्ज न होने से भूमि जल के स्तर का गिरना।
4 - भूमि जल - रिचार्ज की तुलना में जल दोहन का अधिक होना।
5- वर्षा ऋतु में खेतों में जायद की फसलें होना।
उक्त बिंदुओं पर यदि हम गहराई से विचार करें तो पाते हैं कि भविष्य में भूमि जल ,जो आज आम उपभोक्ता के लिए सर्व सुलभ है उसमें शायद परिवर्तन की स्थिति आ सकती है। भविष्य में ऐसी भी स्थिति आ सकती है कि अन्य खनिजों की भांति भूमि जल पर सरकार का स्वामित्व हो जाये।
सुझाव
1- भूमि जल का दुरूपयोग न करें।
2 -खेतों में मेड़ों को ऊंचा कर वर्षा का जल रोकें।
3 - सभी तालाब अतिक्रमण मुक्त हों।
4 -चूँकि अब सभी जगह पक्के मकानों का प्रचलन है इस लिए गावों में भी तालाब गहरे नहीं हो रहे हैं इसलिए तालाबों से मिटटी खोदने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
5 - गावों या कस्बों में जल प्रवाह बावड़ी , तालाबों की ओर हो जिससे पहले बावड़ी और तालाब जल से भर सकें।
गुरुवार, 13 मई 2021
कोरोना की दूसरी लहर में अवसर की तलाश
द्वारा: अशर्फी लाल मिश्र
updated on 03 /06 /2021
कोरोना की दूसरी लहर के बीच ही बाबा रामदेव ने अपना व्यापार चमकाने की दृस्टि से एलोपैथी एवं उसकी चिकित्सा पद्धति एवं चिकित्सकों की कटु आलोचना की। बाबा राम देव आयुर्वेद की प्रशंसा तो कर सकते थे लेकिन एलोपैथी चिकित्सा पद्धति एवं विज्ञान की आलोचना करते से बचना चाहिए था। जब सम्पूर्ण राष्ट्र कोरोना महामारी की चपेट में था और कोरोना योद्धा डॉक्टर एवं अन्य सहयोगी जान की बाजी लगाकर कोरोना का सामना कर रहे थे तब बाबा रामदेव ने एलोपैथी और उनके डॉक्टरों का उपहास किया जो उचित नहीं कहा जा सकता।
13/05/21
आज सम्पूर्ण राष्ट्र जब कोविड 19 के संकट के दौर से गुजर रहा है। तब राष्ट्र विरोधी, समाज विरोधी, विपक्ष एवं काला बाजारी करने वाले अपने अवसर की तलाश में जुटे हुए हैं।
प्राकृतिक आपदा या अन्य आपात स्थिति में सम्पूर्ण राष्ट्र को एक जुट होकर उसका सामना करना चाहिए।लेकिन ऐसा नहीं हो रहा।
कोरोना की पहली लहर में सम्पूर्ण देश में केंद्र द्वारा एक साथ लॉक डाउन लगा था तब परिणाम अच्छे रहे और सम्पूर्ण विश्व में भारत की सराहना हुई थी।उस समय विपक्ष ने चाहा था कि लॉक डाउन राज्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि राज्यों में बेरोजगारी बढ़ रही है।
आज जब लॉक डाउन लगाना राज्यों पर छोड़ दिया गया।तब देश की स्थिति बदतर हो गई और विश्व में भारत की बदनामी भी हो रही है।
आखिर ऐसा क्यों है? क्योंकि विपक्ष हर स्थिति में अवसर की तलाश में रहता है।
सोशल वर्कर /राजनेता
राजनेता अपने को समाज सेवक (Social worker) कहते है और सोशल वर्कर के रूप में भारत रत्न जैसे पुरस्कार पाने की भी इच्छा भी करते है।
आज कोरोना महामारी अवसर पर कितने ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने देश की इस संकट की घड़ी में लोगों की सहायता के लिए हाथ बढ़ाये हैं।
कितने राजनेता/सोशल वर्कर हैं जिन्होंने अस्पताल खोले हों, बेड उपलब्ध कराए हैं या मरीजों के लिए ऑक्सीजन उपलब्ध करायी। अधिकांश राजनेता जनता का मूड बदलने के लिए बयानबाजी करते हैं।
एक कम बुद्धि के राजनेता ने कहा कि वैक्सीन भाजपा की है ।इससे लोगों में भ्रम पैदा हुआ और लोगों ने वैक्सीन से दूरी बना ली।परिणाम स्वरूप कोरोना की दूसरी लहर का जनता में विनाशकारी रूप देखने को मिला। सभी लोग भलीभांति जानते हैं कि वैक्सीन वैज्ञानिक बनाते हैं।
एक राजनेता , जो एक राजनीतिक पार्टी के महामंत्री भी हैं अवसर की तलाश में जनता को गुमराह करने के लिए कहते हैं कि हमारी पार्टी के एक नेता को सरकार ने कोरोना पॉजिटिव कर दिया।यह कितना हास्यास्पद बयान है।
बयानबाजी करने वाले राजनेता अच्छी तरह जानते हैं कि कोरोना महामारी आक्रमण करने में भेदभाव नहीं करती।
काला बाजारी
जब से कोरोना की दूसरी लहर आई तब से काला बाजारी चरम पर है।जीवन रक्षक दवाएं अंकित मूल्य से कई गुना अधिक मूल्य पर बिक रही हैं ।प्राइवेट अस्पतालों में इलाज भी कई गई गुना मंहगा हो गया है। फार्मेसी और प्राइवेट अस्पताल अवसर का भरपूर फायदा उठा रहे हैं।
फल विक्रेता, परचून की दुकान वाले या अन्य दुकानदार भी अवसर का भरपूर फायदा उठा रहे हैँ।
मंगलवार, 11 मई 2021
आतिशबाजी और जनरेटर पर पूर्ण प्रतिबंध हो
द्वारा: अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
आज सम्पूर्ण विश्व में कोरोना महामारी (कोविड 19) से हाहाकार मचा हुआ है। कोविड 19 से आज संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद भारत सर्वाधिक प्रभावित देश है।
आज हमें जो भी कोविड19 से प्रभावित आंकड़े प्राप्त हो रहे हैं वे चाहे पॉजिटिव हों या ठीक हुए हों या फिर मृत्यु के आंकड़े हों सभी सरकारी अभिलेखों के आंकड़े हैं। इससे इतर जाने कितनी कोरोना से मौतें हो रही हैं उनका उल्लेख कहीं नहीं मिलता।
जाने कितने लोग माइल्ड कोरोना से प्रभावित हैं जो स्वयं ही अपने घर में आइसोलेट हो गए और उनमे बहुत लोग ठीक भी हुए और कुछ काल कवलित हो गए।
ऑक्सीजन स्तर
भारत में लगभग सभी जगह पेड़ पौधे एवं हरियाली है।वायुमण्डल में ऑक्सीजन कमी नहीं है लेकिन पराली जलाने, आतिशबाजी ,जनरेटर का स्तेमाल, पुराने वाहन (ट्रक, बस,लोडर,ट्रेक्टर, दुपहिया वाहन ,जुगाड़ गाड़ी जो मोटर साईकल से चलती है,आदि।) से ऑक्सीजन की कमी और कॉर्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है।
आज कोरोना महामारी के समय वायु मण्डल में ऑक्सीजन की कमी से न केवल महा नगरों में बल्कि देहात में भी लोग प्राण त्याग रहे हैं।
देश के शीर्षस्थ न्यायालय ने भी ऑक्सीजन की कमी पर चिंता जाहिर की है।
आज तुरन्त सहायता पहुंचने के लिए अस्पतालों में देश विदेश से ऑक्सीजन सिलिंडरों की आपूर्ति हो रही है।
लेकिन दूसरी तरफ सार्वजनिक समारोह विवाह आदि के अवसर पर आतिशबाजी और डीजल जनरेटर का धड़ल्ले से स्तेमाल हो रहा है। क्या इससे वायुमंडल का ऑक्सीजन स्तर बढ़ रहा है?
सरकार अभी तक अस्पतालों तक ही मुश्किल से ऑक्सीजन सिलिंडर उपलब्ध कराने में व्यस्त है।
तत्काल उपाय
सरकार को चाहिए कि वायु मण्डल में ऑक्सीजन के स्तर को स्थिर करने के लिए तत्काल प्रभाव से आतिशबाजी, जनरेटरों का प्रयोग एवं पुराने वाहनों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा देना चाहिए।
यदि ऐसा नहीं हुआ तो आगे चलकर हर व्यक्ति को अपने गले में सिलिंडर डाल कर चलना होगा।
अभिमत
1-आतिशबाजी पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
2-डीज़ल जनरेटर पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
3-पुराने वाहनों (चार पहिया,तीन पहिया,दो पहिया एवं जुगाड़ गाड़ी आदि) पर प्रतिबंध लगाया जाए।(इलेक्ट्रिक वाहन छोड़कर)
गुरुवार, 8 अप्रैल 2021
गुणवत्ता गिर रही है, कीमतें बढ़ रही हैं
| अशर्फी लाल मिश्र |
| Harpic |
शनिवार, 20 मार्च 2021
समय समय पर आरक्षण की समीक्षा हो
| Asharfi Lal Mishra |
![]() |
| सुप्रीम कोर्ट का निर्णय |
शुक्रवार, 12 मार्च 2021
छात्रों में अभिव्यक्ति का विकास सांस्कृतिक कार्यक्रम द्वारा
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021
Notable teachers of Kanpur Dehat district
By-Asharfi Lal Mishra
A brief description of selected notable teachers of Kanpur Dehat is given bellow:-
1-Prakash Chandra Mishra [1]
He was the founder principal at Galuapur Inter College Galuapur . He was the awarded teacher by state government of Utter Pradesh . He was devoted to the school.
![]() |
| Asharfi Lal Mishra |
He was an eminent teacher of mathematics at Galuapur Inter College Galuapur . He was counted among the best mathematics teachers in undivided Kanpur district. [3] [4] The book of Geometry written by him was very popular. He was awarded Teacher Award in the year 1998. [5] He was devoted to school.He is an educationist ,author [7] ,poet [6] [6a] and a good blogger [8] [9] too.His literary services are available digitally.[10] .He is also Youtuber. [11]
3-Ganga Charan Agnihotri [2]
He was founder principal at RPS Inter College Rura . He was devoted to the school.
4-Ram Khilawan Shukla [2]
He was an eminent teacher at RPS Inter College Rura and a good artist too.
5-Radhey Shyam Chaturvedi [1]
He was an eminent English teacher at Galuapur Inter College Galuapur.
6- Rameshwar Prasad Dwivedi
He was founder principal at R S G U Post Graduate Degree College Pukhrayan . He was member of Uttar Pradesh Secondary Education Commission. He was devoted to the college.
7- Chandrika Prasad Pandey
He was founder principal of Akbarpur Inter College Akbarpur .He was devoted to the school.
8- Radhey Shyam Katiyaar
He was founder principal at Gram Vikas Inter College Budhauli . He was devoted to the school.
9- Prabhu Dayal Katiyar
He was founder principal at Patel Vidyapeeth Inter College Baraur .He was devoted to the school.
सोमवार, 8 फ़रवरी 2021
कानपुर देहात जिले के उल्लेखनीय शिक्षक (रिपोर्ताज)
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र
| अशर्फी लाल मिश्र |
कानपुर देहात के चुनिंदा उल्लेखनीय शिक्षकों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया जा रहा है :
1-प्रकाश चंद्र मिश्र (Prakash Chandra Mishra)[a]
Galuapur Inter College Galuapur के संस्थापक प्रधानाचार्य थे। राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत शिक्षक थे।अनुशासन प्रिय, विद्यालय के लिए समर्पित थे।
2-अशर्फी लाल मिश्र (Ashrafi Lal Mishra)[a] 1[ a]
![]() |
| अशर्फी लाल मिश्र |
Galuapur Inter College Galuapur में गणित शिक्षक थे।[1] [2] अविभाजित कानपुर जिले में गणित के श्रेष्ठ शिक्षकों में गिनती थी। इनके द्वारा लिखी गई रेखागणित की पुस्तक काफी लोक प्रिय थी।[3] 1998 में शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित।[4] अनुशासन प्रिय एवं विद्यालय के लिए समर्पित थे। आप एक शिक्षाविद ,कवि[5] 5(a) ,लेखक[6] एवं ब्लॉगर [7] [8] हैं। आप की साहित्यिक सेवाएं डिजिटल हैं।[9] । अनुशासन प्रिय एवं विद्यालय के लिए समर्पित शिक्षक थे।
3-गंगा चरण अग्निहोत्री (Ganga Charan Agnihotri)[b]
R P S Inter College Rura में संस्थापक प्रधानाचार्य थे।इनके कार्य काल में विद्यालय को कला, विज्ञान,कृषि एवं वाणिज्य वर्ग में इण्टर की एक साथ मान्यता मिली। अनुशासन प्रिय एवं विद्यालय के लिए समर्पित थे।
4- राम खिलावन शुक्ल (Ram Khilawan Shukla )[b]
R P S Inter College Rura में हिंदी विषय के प्रतिष्ठित शिक्षक थे। नाटक में अभिनय भी करते थे। अनुशासन प्रिय एवं समर्पित शिक्षक थे।
5 - राधेश्याम चतुर्वेदी (Radhey Shyam Chaturvedi)[a]
Galuapur Inter College Galuapur में अंग्रेजी के शिक्षक थे। अनुशासन प्रिय एवं समर्पित शिक्षक थे।
6 -रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी (Rameshwar Prasad Dwivedi)
R S G U Post Graduate College Pukhrayan के संस्थापक प्राचार्य थे। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा आयोग के सदस्य थे। अनुशासन प्रिय और संस्था के लिए समर्पित थे।
7- चन्द्रिका प्रसाद पाण्डेय (Chandrika Prasad Pandey)
Akbarpur Inter College Akbarpur के संस्थापक प्रधानाचार्य थे। अनुशासन प्रिय एवं संस्था के लिए समर्पित थे।
8 -राधे श्याम कटियार (Radhey Shyam Katiyar)
Gram Vikas Inter College Budhauli के संस्थापक प्रधानाचार्य थे। अनुशासन प्रिय और विद्यालय के लिए समर्पित थे।
9 -प्रभु दयाल कटियार (Prabhu Dayal Katiyaar )
Patel Vidyapeeth Inter College Baraur के संस्थापक प्रधानाचार्य थे। अनुशासन प्रिय और संस्था के लिए समर्पित थे।
शनिवार, 6 फ़रवरी 2021
जनतांत्रिक मूल्यों में ह्रास
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र
जैसे जैसे भारतीय लोकतंत्र की आयु बढ़ती जाती है वैसे वैसे लोकतांत्रिक मूल्यों में ह्रास होता जाता है। 2021 में भारत स्वतंत्रता की हीरक जयंती का उत्सव मनाने जा कहा है फिर भी कुछ दिशाओं में सरकार आगे बढ़ने का साहस नहीं कर पा रही है।
सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो लेकिन आज तक जनप्रतिनिधियों की योग्यता निर्धारित करने पर सभी दल शांत रहते हैं।
आज चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर भारतीय प्रशासनिक सेवा तक की सेवा में जाने के लिए योग्यताएं निर्धरित है लेकिन जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर है उनके लिए आज तक कोई भी योग्यता निर्धारित नहीं है।
जनतंत्र के उद्भव काल में लोक सभा , विधान सभाओं आदि के निर्वाचन में समाज सेवा के लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति ही चुनाव मैदान में उतरते थे लेकिन आज स्थिति इसके बिलकुल विपरीत है। आज स्थिति यह है कि न ही शिक्षा की जरूरत है ,न ही समाज सेवा की।
आज चुनाव मैदान में उतरने के लिए जरूरत है :
1 -धनबल
2 -क्षेत्र में दबदबा
3 - कानून से बचने की क्षमता
4 -आपराधिक छवि
5 -दल के मुखिया की जनता में छवि
चूंकि उम्मीदवार की समाज में कोई पृष्ठ भूमि नहीं होती अतः धनबल से ही समाज में पहचान बनाई जा सकती है।
यदि क्षेत्र में दबदबा है तो भी जनता से वोट मिलने की उम्मीद की जा सकती है।
भारत निर्वाचन आयोग या राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा सभी चुनावों में प्रत्येक पद के उम्मीदवार के लिए चुनाव में चुनाव व्यय निर्धारित है फिर भी इस सीमा का उल्लंघन करना बहुत ही आसान है।
किसी भी चुनाव की अधिसूचना जारी होने के पहले उम्मीदवार कितना भी धन प्रचार में खर्च कर सकता है। अधिसूचना पूर्व प्रत्याशी द्वारा किया गया खर्च कानून की दृष्टि में कोई अपराध ही नहीं है। यह है क़ानून से बचने की प्रत्याशी क्षमता।
अधिसूचना पूर्व प्रत्याशी लाखों/करोड़ों रुपये अपने क्षेत्र में कट आउट ,होर्डिंग,पोस्टर ,बैनर ,वॉलपेंटिंग आदि पर खर्च कर देते हैं।
![]() |
| उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना के पूर्व प्रत्याशी का प्रचार |
चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद प्रशासन उक्त प्रचार सामग्री को हटाने पर लाखों/करोड़ों रुपये व्यय करता है।
रहा न प्रत्याशी का दिमाग ब्यूरोक्रेसी के आगे आगे चलता है। जब पोस्टर ,बैनर लगाए जाते है या वाल पेंटिंग होती है तब प्रशासन सोता है जब प्रत्याशी का जनता में प्रचार हो चुका होता है तब कहीं प्रशासन की नींद खुलती है। हमारा कहने का आशय यह है जब अधिसूचना जारी नहीं होती उसके पहले ही प्रत्याशी क्षेत्र में प्रचार सामग्री के माध्यम से अपने को सशक्त उम्मीदवार के रूप में जनता के बीच प्रस्तुत करने में सफल रहते हैं। पर्यावरण को कितनी हानि होती है यह न तो प्रत्याशी समझता है और न ही प्रशासन।
इस अप्रत्याशित प्रचार और खर्च पर प्रिंट मीडिया के रिपोर्टर्स की आँखें सदैव बंद रहती है.हर खम्भे पर लगे पोस्टर ,जगह जगह होर्डिंग ,बैनर हर किसी को आकर्षित करते हैं लेकिन लोकतंत्र के प्रहरी एवं चतुर्थ स्तम्भ की निगाह में ऐसा कुछ दिखाई ही नहीं देता।
ओपिनियन
1 - प्रत्येक स्तर पर उम्मीदवार की अनिवार्य योग्यता निर्धारित हो।
2 -अनिवार्य योग्यता में दो बच्चे वालों की प्रत्याशिता को जोड़ा जा सकता है। जिससे देश में बढ़ रही जनसँख्या पर अंकुश लगेगा।
3 - चूँकि पदों में आरक्षण है इसलिए आरक्षण में भी दो बच्चों की शर्त जोड़ी जा सकती है। इससे भी जनसँख्या में नियमन होगा।
4 -अधिसूचना पूर्व चुनाव प्रचार अवैध ठहराया जाय।
5 - यदि प्रत्येक पद की अनिवार्य शैक्षिक एवं समाज सेवा की अर्हता निर्धारित कर दी जाय तो चुनाव पूर्व प्रचार नहीं होगा एवं अधिसूचना के बाद प्रचार सामग्री हटाने की जरूरत नहीं होगी।
6 - जनतंत्र को सुदृढ़ करने के लिए जनप्रतिनिधियों के लिए समाज सेवा अनिवार्य की जाय। इसके लिए समाज सेवा में सर्टीफिकेट कोर्स ,डिप्लोमा कोर्स एवं डिग्री (B. Tech.) पाठ्य क्रम प्रारम्भ किये जाय।
मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021
Galuapur Inter College overview
| अशर्फी लाल मिश्र |
![]() |
| गलुवापुर इण्टर कॉलेज गलुवापुर ,कानपुर देहात -गणतंत्र दिवस 2021 समारोह का एक दृश्य |
23 जनवरी 2021 को अचानक व्हाट्सएप्प के माध्यम से गलुवापुर इण्टर कॉलेज गलुवापुर ,कानपुर देहात के प्रधानाचार्य ओम प्रकाश सिंह का एक आमंत्रण पत्र मिला जिसमे विद्यालय में हो रहे 72 वें गणतंत्र दिवस में सम्मिलित होने का अनुरोध किया गया था।
![]() |
| 72 वें गणतंत्र दिवस समारोह पर गलुवापुर इण्टर कॉलेज गलुवापुर ,कानपुर देहात के छात्रों का एक दृश्य |
![]() |
| मंच पर बैठे अतिथिगण बाएं से दाएं --> सुरेश चंद्र द्विवेदी (पूर्व शिक्षक) ,जय नारायण मिश्र (पूर्व शिक्षक ),राम कुमार गुप्त (पूर्व छात्र ,निवर्तमान जनरल मैनेजर NTPC, Advisor-UPRVUNL), अशर्फी लाल मिश्र A(पूर्व शिक्षक ,शिक्षाविद ,कवि,लेखक एवं [1] ,ब्लॉगर [2]), ओम प्रकाश सिंह पटेल (प्रधानाचार्य ) इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने विद्यालय के मेधावी छात्रों एवं सांस्कृतिक कार्य क्रमों में भाग लेने वाले छात्रों को पुरस्कार वितरित किये। सम्पूर्ण सेवा निवृत्त शिक्षकों,शिक्षणेत्तर कर्मचारियों एवं कार्यरत शिक्षकों ें एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को भी मुख्य अतिथि ने पुरस्कार देकर सम्मानित किया। |
अनर्गल बयानबाजी से कांग्रेस की प्रतिष्ठा गिरी
ब्लॉगर : अशर्फी लाल मिश्र अशर्फी लाल मिश्र कहावत है कि हर ऊँचाई के बाद ढलान होती है । ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने में कांग्रेस ने जनता ...
-
द्वारा : अशर्फी लाल मिश्र ©,अकबरपुर,कानपुर। अशर्फी लाल मिश्र कान्यकुब्ज ब्राह्मण -कात्यायन गोत्रीय मिश्र (बैजेगांव ) की एक शृंखला ======...
-
लेखक : अशर्फी लाल मिश्र Asharfi Lal Mishra छछूंदर की यह विशेषता है कि यदि सांप उसे निगल ले तो या तो वह अन्धा हो जाता है या फिर मर ...
-
द्वारा : अशर्फी लाल मिश्र Asharfi Lal Mishra Updated on 01/08/2024 सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC/ST वर्ग में कोटे के अंतर्गत कोटा स्वीकृत हुआ...
















